चांद की ज़मीन से एक बड़ी खबर है। खबर है कि चांद रूखा नहीं है। खबर है कि चांद के पास भी पानी है। इस खबर ने नासा के वैज्ञानिकों के शोध पर पानी पर पानी नहीं फेरा है। और इस खबर ने नासा के वैज्ञानिकों के पानी को भी बरकरार रखा है। अंग्रेज़ी में पानी को वॉटर कहते हैं और इसमें इसका मतलब बस एक ही होता है। लेकिन हिंदी भाषा या कहलें हमारी मातृभाषा में पानी के कई मायने हैं।
"रहीम कहते हैं रहिमन पानी राखिए
बिन पानी सब सून"
तो साहब पानी बचाना ज़रूरी है सो नासा के वैज्ञानिकों का पानी बच भी गया। ये भी इंसान की महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है। कि हम धरती के पानी के घटते रिसोर्सेज़ को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं वहीं चांद पर पानी होने की बात पर हमारे चेहरे पर चमक आ जाती है। आपको बताते चलें कि धरती पर कुल मौजूद पानी का महज 3 फीसदी ही हमारे जीवन के लायक है और वो भी कम हो रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि ये हम इंसानों की बड़ी उपलब्धि है और हमारी तकनीक की ऊंचाईयों पर फक्र करने की वजह भी। लेकिन इससे बड़ी चुनौती जो हमारे सामने है वो धरती पर ही खड़ी हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग जिसकी वजह से हमने जलवायु तक को खफा कर दिया है। एक बड़ी चुनौती है हमारे लिए और वैज्ञानिकों के लिए भी।
पानी की खोज के बाद भले ही अभी चांद पर इंसान के शिफ्ट होने में खासा वक्त और दिमाग खर्च करना पड़े लेकिन पर्यावरण अंसतुलन ने जलवायु को शिफ्ट करना शुरू कर दिया है। जलवायु की ये शिफ्टिंग इंसान के चांद पर शिफ्ट होने के बाद जितनी खुशी देगी उससे कहीं ज्यादा धरती पर रहने वाले तमाम लोगों के लिए मुसीबत को सबब बन सकती है। बहरहाल ये खबर निश्चित रूप से हम इंसानों के लिए बड़ी खबर है। वैज्ञानिकों के लगातार किए मेहनत के सफल होने की खबर है इसपर हम फक्र कर सकते हैं। पर ये और भी अच्छा होगा कि इंसान ज़मीन के पानी को बचा ले। अंग्रेज़ी वाटर को भी और हिंदी के पानी को भी।
Wednesday, November 18, 2009
बराक को आ गई चीनी भाषा
आइए हाथ मिलाएं हम भी हम भी और हम भी।आइए सुर मिलाएं हम भी हम भी हम भी। अमेरिका अश्वमेध यज्ञ कर रहा है। और अमेरिका के नेतृत्व को दुनियावी सहमति हासिल कराने के मकसद से निकले हैं अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा। हांलाकि अमेरिकी राष्ट्रपति ये बात कह नहीं रहे हैं लेकिन ये बात किसी से छुपी भी नहीं है। बराक ओबामा.... माफ किजिएगा नोबल बराक ओबामा....नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित अमेरिक राष्ट्रपति चीन पहुंचे हुए हैं। हाथों से हाथ मिलाए जा रहे हैं। आज का नोबेल शांति दूत अचानक तिब्बत के निर्वासित शांति दूत यानि दलाई लामा के बरक्स खड़ा हो जाता है। और अनकहे ही कह जाता है कि तुम्हारी अब तक की लड़ाई बेमतलब है वाहियात है और बेमकसद है। तिब्बत चीन का ही हिस्सा है।
तो साहब सुर मिल जाते हैं और ये सुनने के बाद लाल ड्रैगन के राजा के चेहरे पर शांति उभरती है। सुर के मिलते ही तालियां बज उठती हैं और ये बात मुक्कमल हो जाती है कि ये आज का नया....ब्रांड न्यू नोबेल शांति दूत.....पुराने वर्जनवाले नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा से काफी बड़ा है। क्योंकि जो लड़ाई तिब्बत को लेकर करीब करीब आधी शताब्दी तक दलाईलामा लड़ते रहे उस लड़ाई को इस नए शांति दूत ने अपने लफ्ज़ों से धुंआ कर दिया। दरअसल तिब्बत पर 1950 के दशक से चीन का ही शासन है। चीन दलाई लामा पर अक्सर आरोप लगाता रहा है कि वो तिब्बत को देश के शेष हिस्से से अलग कराने के लिए अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। तो बराक ओबामा साहब ने ये बात कह कर चीन के इस दावे को भी मौन स्वीकृति दे दी है। और चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ की तिब्बत से जुड़ी सारी चिंताओं से मुक्त कर दिया है।
खैर इस पूरी खबर को दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है। अमेरिका उसी राह पर है जिस राह पर वो हमेशा से चलता रहा है। लाभ मुद्रा का है....लाभ कमाई का है....क्योंकि वो बखूबी जानता है कि अब शक्ति का नहीं शांति का मुखौटा ओढ़कर रेस जीती जा सकती है। ईराक मसले पर विश्व बिरादरी में और खासकर घर में हुई बुश शासन की थू-थू से बराक इतना तो सबक लिया ही होगा। हां ये धारणा बदल लिजिए कि जिसके पास पैसा है उसी के पास ताकत है। बल्कि जिसके पास पैसा है जिसके पास शांति का मुखौटा है उसके पास ताकत है। ओबामा ये बात बेहतर समझते हैं तभी तो अमेरिका ने उन्हे भेजा है दुनिया फतह करने के लिए अश्वमेध यज्ञ पर। हां शांति के नए वर्जनवाले अमेरिकी राष्ट्रपति ने शांति के पुराने वर्जन वाले लामा को नसीहत दी है कि बातचीत करो चीन से।
तो साहब सुर मिल जाते हैं और ये सुनने के बाद लाल ड्रैगन के राजा के चेहरे पर शांति उभरती है। सुर के मिलते ही तालियां बज उठती हैं और ये बात मुक्कमल हो जाती है कि ये आज का नया....ब्रांड न्यू नोबेल शांति दूत.....पुराने वर्जनवाले नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा से काफी बड़ा है। क्योंकि जो लड़ाई तिब्बत को लेकर करीब करीब आधी शताब्दी तक दलाईलामा लड़ते रहे उस लड़ाई को इस नए शांति दूत ने अपने लफ्ज़ों से धुंआ कर दिया। दरअसल तिब्बत पर 1950 के दशक से चीन का ही शासन है। चीन दलाई लामा पर अक्सर आरोप लगाता रहा है कि वो तिब्बत को देश के शेष हिस्से से अलग कराने के लिए अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। तो बराक ओबामा साहब ने ये बात कह कर चीन के इस दावे को भी मौन स्वीकृति दे दी है। और चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ की तिब्बत से जुड़ी सारी चिंताओं से मुक्त कर दिया है।
खैर इस पूरी खबर को दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है। अमेरिका उसी राह पर है जिस राह पर वो हमेशा से चलता रहा है। लाभ मुद्रा का है....लाभ कमाई का है....क्योंकि वो बखूबी जानता है कि अब शक्ति का नहीं शांति का मुखौटा ओढ़कर रेस जीती जा सकती है। ईराक मसले पर विश्व बिरादरी में और खासकर घर में हुई बुश शासन की थू-थू से बराक इतना तो सबक लिया ही होगा। हां ये धारणा बदल लिजिए कि जिसके पास पैसा है उसी के पास ताकत है। बल्कि जिसके पास पैसा है जिसके पास शांति का मुखौटा है उसके पास ताकत है। ओबामा ये बात बेहतर समझते हैं तभी तो अमेरिका ने उन्हे भेजा है दुनिया फतह करने के लिए अश्वमेध यज्ञ पर। हां शांति के नए वर्जनवाले अमेरिकी राष्ट्रपति ने शांति के पुराने वर्जन वाले लामा को नसीहत दी है कि बातचीत करो चीन से।
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