सुनाहै कि दुनिया बदल रही है
किस तरह....
चेहरों पर घाव लिए लोग घूमते हैं
किसी भयानक ख्वाब की तरह...
इधर से उधर...
बिलबिलाते, चीखते, चिल्लाते लोग
ज़िंदगी से ठगे गए ज़िंदगी को बचाते लोग
नसें फट रही है...दिल बैठ रहा है
अब तक का समझा, जाना, सब उलट रहा है
सवाल ये कि ये बदलाव हमें किस दिशा में पलट रहा है
Thursday, June 11, 2009
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