सुनिए खबर दिलचस्प है। पाकिस्तान के आला हुक्मरानों में से एक युसुफ रज़ा गिलानी के बोल फूटे हैं। वैसे तो अपने बदतर अंदरूनी हालातों से उपजे सवालों से तरबतर पाकिस्तानी हुक्मरानों के बोल बमुश्किल फूटते हैं। और अगर फूटते भी हैं तो भारत को पानी पी पी कर कोसने के लिए लेकिन इसबार कहानी अलग है। रोमांचक है और हो सकता है कि कहानी का ये पार्ट आपको दोबारा सुनने को न मिले। तो खबर ये है कि कि पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म जनाब युसुफ रज़ा गिलानी ने ठोक बजाकर...चिल्ला चिल्लाकर...ये बात कही है कि पाकिस्तान अमेरिका के हाथों की कठपुतली नहीं है। स्टेटमेंट छोटा है पर पाकिस्तान का कोई नेता अगर ये बात कहता हो तो मायने काफी बड़े हो जाते हैं। इसलिए नहीं कि दोनों महान शक्तियां हैं बल्कि इसलिए क्योंकि अमेरिका के दिए आर्थिक मदद से टिका ये देश ये बाते कह रहा हैं।
इस स्टेटमेंट की जड़ से एक और सवाल उपजता दिखाई देता है कि क्या अमेरिका पाकिस्तान को अपने हाथों की कठपुतली ही मानता है। इस सवाल से 'क्या' निकाल दिजिए जो जवाब में मिलेगा वो ही सही है। अमेरिका जैसे पूंजीपति देश से हम ये उम्मीद करें कि वो शांति की स्थापना के लिए काम कर रहा है तो खुद को भ्रम में डालने जैसी बात होगी। शांति का पैरोकार बनने वाले अमेरिका के पीठ थपथपाउ उपलब्धियों की फेहरिस्त में इराक से ज्यादा स्थाई और ताज़ा उदाहरण कुछ और नहीं हो सकता। ईराक में अमेरिकी हमले के बाद जितनी हिंसा हुई है उतनी तानाशाह सद्दाम हुसैन के वक्त में भी नहीं हुईं। बहरहाल हम बात कर रहे हैं युसुफ रज़ा गिलानी की। पाकिस्तान के अचानक ज़िंदा हो गए स्वाभिमान की।
अब ज़रा इस बयान की और इस बयान के ज़रिए पाकिस्तान के जागे स्वाभिमान की जांच भी कर लें। तो पाकिस्तान के यही वज़ीरे आज़म जो कल तक वज़िरिस्तान में और दूसरे तालिबान प्रभावित इलाकों में अतिरिक्त अमेरिकी फौज की तैनाती पर मुंह बिचकाया करते थे ब्रिटेन जाते ही इनकी तैनाती के लिए तैयार हो गए हैं। तो कठपुतली बनना कबूल करें या न करें गिलानी साहब लेकिन धागे तो आपको किसी के हाथों में तो देने ही होंगे। चलिए कठपुतली न सही पतंग सही संज्ञा बदल देते हैं। अब ये फैसला करना आपकी मजबूरी है कि डोर आखिर किसके हाथ में थमानी है अमेरिका के हाथों में जो हर साल करोड़ों डॉलर आपकी अर्थव्यवस्था और विकास के लिए देता है जिसकी मोटी राशि आप भारत के खिलाफ हथियार जुटाने में खर्च करते हैं या फिर इस डोर को उनके हाथों में देना है जो आपके लिए भस्मासुर बन चुके हैं और आपको खाक में मिलाने पर अमादा हैं। चलते चलते पाकिस्तान के इन वज़ीरे आज़म महोदय के स्वाभिमान का एक और ज़िक्र ब्रिटेन ने युसुफ रज़ा गिलानी को पांच करोड़ पाउंड दिए हैं। मकसद है दक्षिणी वजि़रिस्तान और स्वात में घर से बेघऱ हुए लोगों की ज़िंदगी को पटरी पर लाना।
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